गुरुवार, 23 अगस्त 2012

हर दिन




हर दिन
जब दिन से छिन जाता है 
उस दिन का सूरज
शाम के दामन में 
वह तोड़ देता है अपना दम 
और पीछे छूट  जाता है 
एक कोलाहल 
जिसमें दबा रह जाता है   
हमारे और तुम्हारे 
जीवन-संघर्ष का संगीत 

हर शाम जब 
फलक पर सजते हैं 
असंख्य दीये 
कहीं न कहीं 
रोशनी का एक कतरा 
सिर छिपाने के लिए 
ढूंढ रहा होता है 
एक एकांत 
और अंधकारमय  
कोना 

हर रात जब 
अपनी मंजिल से दूर 
धरती के किसी अनजान हिस्से में  
किसी पथिक की आँखें 
ढूंढती हैं कोई आश्रय 
दूर कोई गा रहा होता है  
दिन की  मर्शिया  का 
अंतिम पद

अशोक 
मीना बाजार 
दुबई 


गुरुवार, 28 जून 2012

दम तोड़ता एक पुस्तकालय


दरभंगा में ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय के कैम्पस के नजदीक एक पुस्तकालय है. पुस्तकालय का होना तो आश्चर्य नहीं पैदा करता पर शनिवार के दिन भी इसके खुले होने कि उम्मीद मुझे नहीं थी. किसी पुस्तकालय को इतना अनाकर्षक मैंने कहीं नहीं देखा था. अगर इस भवन के बाहर पुस्तकालय नहीं लिखा होता तो शायद मुझे इस भवन में प्रवेश करने के बाद भी पता नहीं चलता कि यह पुस्तकालय है. पुस्तकालय की लौबी में एक दो टेबल लगे थे और एक दो कुर्सियां भी थीं जिनपर पाँव डाले लोग खैनी रगड़ने में व्यस्त थे. लौबी का माहौल कतई ऐसा नहीं कि आपको लग सके कि आप किसी पुस्तकालय में आये हैं. पर अगर आप कट्टर पुस्तक प्रेमी हैं तो यह भी झेल लेंगें. पर मुख्य हाल, जहां पर पुस्तकें रखी गयी हैं-उसका हाल देखने के बाद आपके धैर्य की सारी सीमाएं टूट जायेंगीं. 


जिस दिन मैं इस पुस्तकालय में गया उस रात दरभंगा में बारिश हुई थी. पुस्तकालय भवन के बाहर पानी का ऐसा जमाव नहीं था जिससे आपको लग सके कि यहाँ पिछली रात बारिश हुई पर पुस्तकालय के अन्दर जाते ही, छत से टपकती हुई पानी कि बूंदें, भीगा हुआ फर्श और कहीं कहीं फर्श पर बने गड्ढों में जमा पानी बारिश के बारे में शक की कोई गुंजाइश नहीं रहने देता. एक बेंच पर बारिश में पूरी तरह भीग चुकी कुछ पुस्तकों को उठाकर रख दिया गया था और उसके पास ही गोंद की एक बोतल भी पडी थी जो शायद इस बात का संकेत था कि किसीने इन पुस्तकों की मरहम पट्टी करने कि सोची है. पुस्तकालय के अन्दर बड़ी बड़ी हवादार खिडकियों के बावजूद वहाँ की हवा दमघोंटू थी. मेरा दम घुट रहा था. हो सकता है कि अव्यवस्था को सहने का जिस तरह हम आदी हो चुके हैं उसको देखते हुए आप यह भी बर्दाश्त कर लेंगें. पर सिर्फ तभी तक के लिए जब तक कि आप आलमारियों में बेतरतीब से रखे पुस्तकों में से किसी एक पुस्तक को जिज्ञासावश निकालने के लिए अपने हाथ नहीं बढ़ा देते. पुस्तकों पर इतनी मोटी धूल कि किसी भी पुस्तक का नाम तक पढ़ना मुश्किल. आलमारियों पर लगे मकरजाला को देखकर तो यही लगता था कि शायद महीनों से किसी ने इन पुस्तकों को हाथ नहीं लगाया है और महीनों या यूं कहें सालों से इनपर जमी धूल को किसी ने झाड़ने की जहमत नहीं उठायी है.  
मुझे नहीं लगा कि पुस्तकालय के कर्मचारियों को इस बात का आभास भी था कि नहीं कि वे पुस्तकालय में काम करते हैं. पुस्तकालय को जिस स्थिति में इन कर्मचारियों ने रखा हुआ है उससे तो यही लगता है कि उन्हें किसी भी तरह का प्रशिक्षण नहीं दिया गया है. उनके लिए पुस्तकालय में काम करना किसी अन्य दफ्तर में काम करने से कतई अलग नहीं. 
पुस्तकालय में कर्मचारियों का अभाव है ऐसा नहीं लगता.पर पुस्तकालय का रखरखाव कौन करे. एक टेबल पर कुछ कुछ किताबें रखी थीं और एक सज्जन, जो हर तरह से उस पुस्तकालय के अभिभावक लग रहे थे, गर्दन में बेल्ट लगाए एक महिला से बातचीत में मशगूल थे. उनकी कुर्सी से महज कुछ दूरी पर ही पिछली रात की आंधी-तूफ़ान में कुछ पुस्तकों से आजाद हुए कुछ पन्ने बिखड़े पड़े थे पर उनको या किसी और कर्मचारी को भला इस बात से क्या लेना देना. 
यहाँ संसाधनों का कतई अभाव नहीं है. जिस बात का अभाव है वह है ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा का. इस पुस्तकालय की यह दशा सिर्फ इस लिए है क्योंकि उसके लाइब्रेरियन से लेकर अन्य कर्मचारी तक सब के सब कामचोर हैं. किसी को इस बात से मतलब नहीं कि वे कितने अहम् संस्थान में काम करते हैं और उनकी कर्मठता उनके शहर की प्रतिष्ठा बढायेगी और लोगों में पुस्तक प्रेम जगाने का वह जरिया बन सकते हैं. पुस्तकालय में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है कि उनके पुस्तकालय में पुस्तक प्रेमियों का हमेशा मेला लगा रहे. पर इस सब की कल्पना दरभंगा में करना ....छोडिये इन बातो को. मैथिलों की एक ही खूबी है और वो यह कि वो गाल अछा बजा लेते हैं...अपनी खुद की पीठ को थपथपाने की कला कोई यहाँ के लोगों से सीखे. 

बुधवार, 18 जनवरी 2012

मन में होता है


मन में होता है 
मैं चलता जाऊं 
ऐसे ही 
हवा के साथ 
मैं बहता जाऊं 
वेगवती 
धारा के साथ 
ऐसे ही 
मैं किरणों को 
आंजुर में उठाऊँ 
और फेंक दूं 
तुम्हारी ओर 
मैं दौडूँ 
लहरों पर 
मैं खींचूँ 
अमिट लकीर 
रेत पर 
मैं बादलों से ले लूं 
उसका रंग 
और लेप दूं 
सीपी के गाल पर 
मैं छोड़ दूं 
लहरों की छाती पर 
कागज़ की अपनी नाव 
और इंतज़ार करूं
हथेली पर चाँद के 
उतरने का 

सोमवार, 28 नवंबर 2011

किसका हित देखें- देशी कंपनियों का या आम उपभोक्ताओं का ?

कई बार किसी मुद्दे पर शोरगुल को जानबूझकर इतना बढाया जाता है की लोगों को यह पता नहीं लग सके की सच क्या है. मौके का फायदा उठाकर झूठ को सच बनाकर परोस दिया जाता है. फिर चूँकि आम लोगों तक बातें सिर्फ और सिर्फ मीडिया के द्वारा आती है, और मीडिया के अपने हित हैं, सो हम आम आदमी से वह सत्य हमेशा के लिए दूर ही रह जाता है. उससे हमारा साक्षात्कार शायद ही कभी हो पाता है. फिर एक और समस्या आती है. और यह समस्या है विश्वास की. किस के कहने पर विश्वास करें. कौन सच बोल रहा है. क्योंकि हर ऐसे स्रोत जिससे सही सूचनाएं आने की संभावनाएं हैं, वे सब के सब संदेह के घेरे में हैं.  जहां हर आदमी और संस्था सिर्फ पैसे बनाने के लिए ही अपना वजूद बनाए रखना चाहती है , वैसे में इस तरह के वातावरण के बन जाने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए. और तो और, जिन गैर सरकारी संगठनों से यह उम्मीद की जाती थी की वे सच बोलेंगें, उनकी भी विश्वसनीयता संदेह के घेरे में हैं. हो सकता है, इनमें बहुत सारे ऐसे होंगें जो विश्वसनीय हैं पर उनकी आवाज़ भी तो इस कोलाहल में सुनायी नहीं देती. यहाँ तो जो जोर से बोल लेता है उसी की आवाज पहुँचती है और सुनी जाती है भले ही वह सत्य से परे ही क्यों न हो. 

रिटेल सेक्टर में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का विधेयक लाकर केंद्र सरकार ने बवाल खडा कर दिया है. वैसे इस विधेयक पर बवाल होगा यह सबको पता था. फिर सरकार भला क्यों नहीं इससे अवगत हो. सो उसने यह सब जान बूझकर किया है. वो यह दिखाना चाहती है, देश की जनता को की इस विधेयक का विरोध कौन लोग कर रहें हैं.  वह इसमें सफल रही है. पर वह जनता को यह बता नहीं पायी है की इस विधेयक से उनको फायदा क्या होने जा रहा है. और यह काम अगर सरकार विधेयक लाने से पहले करती तो जनता को शायद इसके विरोध करने वालों के बारे में अपनी राय कायम करने में ज्यादा आसानी होती. सरकार को भी कम प्रयास से इस विधेयक का विरोध करने वालों का जनता के सामने पोल खोलने में आसानी होती. पर अगर सरकार सुलझी हुई बातें करेगी तो फिर सरकार कैसी? सो अब एक बड़े  बवाल के हम गवाह बन रहे हैं. 

हर मुद्दे के समर्थक और विरोधी होंगें और इस तरह के हर कदम के अपने फायदे और नुक्सान हैं. जिस विधेयक पर बवाल हो रहा है उसके साथ भी यह बात है. पर इस आधार पर हम विधेयक को ही पूरी तरह खारिज कर दें यह तो अनुचित होगा. इस विधेयक का विरोध इसमें निहित कमियों को दूर करने के लिए होना चाहिए. हमने रिटेल सेक्टर में मल्टी ब्रांड देशी कंपनियों को अनुमति दे ही चुके हैं. अब अगर हम इस तरह की विदेशी कंपनियों को यह अनुमति देना चाहते हैं तो इस पर बवाल क्यों? क्या ऐसा है की हमें अगर हमारे देश वाले लूटें तो ठीक है, विदेशी न लूटें? आज वैश्वीकरण के इस जमाने में देशी कंपनियों और विदेशी कंपनियों में अंतर क्या रह गया है? हमारी कम्पनियां भी तो अन्य देशों में जाकर कारोबार कर रही हैं. हमारी ही कम्पनियां चीन में अपने उत्पादों की फैक्ट्री लगा चुकी है और वहाँ बनी हुई वस्तुएं हमें वापस बेच रही हैं. हमारे देश में मौजूद विदेशी कम्पनियां यहाँ "जय हिंद" का नारा लगाती हैं और हमारे क्रिकेट टीम के जीतने पर जश्न मनाती हैं. वो शायद ऐसा सब कुछ करती हैं जो एक देशी कंपनी से ही हम उम्मीद करते हैं.
इस विरोध से किसको फायदा है ?

जब हम अपने देश में मल्टी ब्रांड विदेशी कंपनियों के आने का विरोध करते हैं तो ऐसा करते हुए हम किसकी जान बचाते हैं? क्या हम ऐसा करके उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा की बात करते हैं? नहीं. जबकि हमारा उद्देश्य यही होना चाहिए. इस विधेयक का विरोध करने वाले राजनीतिक दल हमें सन्देश तो यही दे रहे हैं की हम उपभोक्ताओं के हित की रक्षा की बात कर रहे हैं पर ऐसा है नहीं. वे हमारे देशी कंपनियों को विदेशी कंपनियों से प्रतिस्पर्धा से बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं. आम आदमी जो की उपभोक्ता है, इनमें कहीं नहीं है यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए. 

ये विदेशी कम्पनियां आयेंगीं तो क्या होगा? 
ये विदेशी कम्पनियां अगर हमारे देश में आती हैं, तो निश्चित रूप से हमारे रिटेल सेक्टर का काया कल्प हो जाएगा. एक उदाहरण है. हमारे देश में मोहन मीकिन्स नामक के कंपनी है जो शराब बनाने के अलावा कॉर्नफ्लेक भी बनाती और बेचती है. अगर अपने देश में केलौग के आने के पहले किसी ने मोहन के कांर्न्फ्लेक खरीदे होंगें तो उन्हें याद होगा की उसकी क्या गुणवत्ता थी और उसकी पैकिंग कैसी हुआ करती थी. पर केलौग के आने के बाद अब ज़रा उसी कंपनी के इस उत्पाद की गुणवत्ता और पैकिंग जाकर दुकानों में देख लीजिये-वह केलौग को टक्कर देती है. और मैं केलौग की जगह मोहन के कोर्न्फ्लेक खरीदना ज्या पसंद करता हूँ. मोहन के उत्पादों में यह सुधार सिर्फ प्रतिस्पर्धा की वजह से आयी क्योंकि बाजार में बने रहने के लिए उसको प्रतिस्पर्धी होना पडा नहीं तो केलौग उसे निगल जाती. पर मोहन का कांर्न्फ्लेक ज़िंदा है और वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बन गया है. इससे फायदा किसे हुआ? हम उपभोक्ताओं को. और यह संभव नहीं था अगर केलौग नहीं आती. हम कहना यह चाहते हैं की प्रतिस्पर्धा से उपभोक्ताओं को गुणवत्ता और कीमत दोनों ही मोर्चों पर फायदा होता है.  
सो यह स्पष्ट है की रिटेल क्षेत्र को प्रतिस्पर्धा के लिए खोलना जरूरी है ताकि वस्तुओं की गुणवत्ता में सुधार आये. बाजार में हमें चुनाव करने में आसानी होगी और प्रतिस्पर्धा की वजह से वस्तुओं की कीमतों में कमी होगी. प्रतिस्पर्धा क्या होती है यह दूरसंचार (टेलीकॉम ) क्षेत्र में हम देख ही रहे हैं. और २ज्ञी  घोटाले के बावजूद ऐसा संभव हो पाया है. 

दूसरा मुद्दा है वस्तुओं को एक जगह से दूसरे जगह ले जाने के लिए जरूरी आवश्यक आधारभूत सुविधा की. रिटेल क्षेत्र में विदेशी कंपनियों के आगमन से "लौजीस्तिकल" सुविधाएं सुधरेंगीं क्योंकि उसके बिना इन विशालकाय दुकानों में वस्तुओं की समय पर सुरक्षित आपूर्ति संभव नहीं है. क्या इससे किसानों को फायदा नहीं होगा जिनके उत्पाद बाजार में पहुँचने से पहले ही नष्ट हो जाते हैं? क्या हमें फायदा नहीं होगा जो मजबूरी में दुकानों से बासी, मुरझाई हुई साग-सब्जी उठाकर लाते हैं और कीमत भी ज्यादा देते हैं.

इस तरह ज़रा अनुमान लगाइए की रिटेल क्षेत्र में विदेशी कंपनियों को आने की अनुमति देने से कितने रोजगार पैदा होंगें. दुकानों से लेकर मालों को लाने-ले जाने के कार्यों तक में लोगों को रोजगार के कितने अवसर मिलेंगें? जो लोग रिटेल में विदेशी निवेश की अनुमति का विरोध कर रहे हैं वास्तव में उनके अपने अपने स्वार्थ हैं. इस मुद्दे को राजनितिक पार्टियों के अजेंडे से अलग हटकर देखा  जाना चाहिए-विशुद्ध रूप से एक उपभोक्ता की नज़र से. हाँ, इस तरह की कंपनियों से कच्चा माल आपूर्ति करने वाले स्थानीय छोटे-छोटे किसानों या उत्पादकों को बचाने के लिए किस तरह के उपाय क़ानून में किये जा सकते हैं इस पर जोर दिया जाना चाहिए .

एक और बात. इन दुकानों में महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा रोजगार मिलेगा और शायद यह इससे होने वाले फायदों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है. प्राइवेट बैंकिंग ने जिस तरह से महिलाओं के लिए रोजगार उपलब्ध कराने में नए आयाम जोड़े हैं उसी तरह यह क्षेत्र भी महिलाओं के लिए वरदान साबित होगा. 
और सबसे बड़ी बात यह कि एक उपभोक्ता के रूप में हमारे पास अपनी वस्तुओं के चुनाव के ज्यादा अवसर मिलें इससे हमें कोई रोकने वाला कौन होता है? एक उपभोक्ता के रूप में मैं रिलायंस के स्टोर में  जाकर सामान खरीदूं या वाल मार्ट में, कोई मुझसे चुनाव कि यह आजादी  छीनने वाला कौन होता है?  और मैं निस्संदेह वालमार्ट में सामान खरीदूंगा अगर मुझे वहाँ रिलायंस से ज्यादा सस्ता और अच्छा सामान मिलता है. 

किसी जमाने में इस देश में हिन्दुस्तान मोटर्स की अम्बेसडर कारें ही बिका करती थीं. क्या हमारे देश में अब विदेशी कारें नहीं बिक रही हैं? और क्या उनके साथ साथ टाटा की कारें नहीं बिक रही हैं या उनके आने से टाटा ने अपनी दुकानें बंद कर लीं? उलटे, देशी कम्पनियां इन विदेशी कंपनियों को अपने हिसाब से कड़ी टक्कर दे रही है. 

क्या किसीको बंगलोर में शुरूआती दिनों में केऍफ़सी के विरोध में चले आन्दोलन के बारे में कुछ याद है? क्या कोई कह सकता है की बंगलोर में इस समय केऍफ़सी नहीं है. इस विरोध का एक और आयाम है. समाज का जो संपन्न वर्ग है वह अपने लिए, जो भी वह चाहता है, देश-विदेश कहीं से मंगा लेता है. इस सुविधा से वंचित वो लोग होते हैं जो अपेक्षाकृत उतने धनी नहीं हैं और अपने पसंद की चीज़ें अपने पास के बाज़ार से ही खरीदने के लिए मजबूर हैं. क्या इन लोगों को ऐसे बाज़ार की सुविधा सुलभ नहीं होनी चाहिए जो संपन्न लोगों को है? क्या बाजार की प्रतिस्पर्धा का फायदा उन्हीं लोगों को मिलना चाहिए जो ज्यादा पैसे वाले हैं और बड़े शहरों में रहते हैं? 

इस तरह के मुद्दों पर लोगों में मतविभाजन स्वाभाविक है पर इस घमासान में आम लोगों के हितों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए. आज के वैश्वीकरण के ज़माने में देशी कंपनियों को प्रतिस्पर्धा से बचाना एक नए तरह का भ्रष्टाचार है, इसे कहीं से देश सेवा नहीं मानी जानी चाहिए. वैसे अब भी अपने देश में कुछ लोग विदेशी कंपनी के नाम पर आम लोगों को डरा रहे हैं और शायद खुद को बड़ा देशभक्त साबित करने की कोशिश करते हैं. 

शनिवार, 26 नवंबर 2011

मुशरिफ पार्क की वह सुबह

दुबई में लम्बी दौड़ की प्रतिस्पर्धा (मैराथन) के आयोजनों का सिलसिला शुरू हो चुका है. इसी क्रम में इस शुक्रवार 25 नवम्बर 2011 को मुशरिफ पार्क में डोनट 10 रेस का आयोजन हुआ. यह रेस 10 मील का होता है जो लगभग 16 किलोमीटर के बराबर होता है. मैंने भी अपने दो अन्य मित्रों के साथ इसमें हिस्सा लिया. इस रेस को अधिकतम 2 घंटे में पूरा करना होता है और मैंने इसे 88 मिनट में पूरा किया जो गत साल के मेरे टाइम से लगभग 4 मिनट कम है. 


जैसे की नाम से ही स्पष्ट है, इस रेस के बाद आपको तरह तरह के डोनट खाने को मिलते हैं. और मैंने भी इस कार्य में अपने को रोका नहीं. वहाँ लगभग जितने भी फ्लेवर वाले डोनट थे उनका आनंद मैंने उठाया.


मुशरिफ पार्क में दौड़ना एक बहुत ही सुखद अनुभव है. बल्कि हम इस रेस में शामिल होने के लिए साल भर इसका इंतज़ार करते हैं. यह पार्क मूल रूप से साइकिलिंग के लिए है और यहाँ पर रेसिंग ट्रैक नहीं है. हमलोग साइकिल ट्रैक पर ही दौड़ते हैं. यहाँ लगभग 5 किलोमीटर के ट्रैक को इस रेस के लिए चिन्हित किया गया है जिसका हमें तीन चक्कर लगाना पड़ता है. पार्क में रेस होने की वजह से यहाँ पर हमारा हौसला बढाने के लिए लोग तो नहीं होते क्योंकि शहर से दूर इस पार्क में 7 बजे सुबह तो कोई आपका हौसला बढाने या आपको दौड़ते देखने के लिए आने से रहा. फिर पार्क में प्रवेश शुल्क भी देना पड़ता है और पैसा भरकर कोई किसीकी हौसलाअफजाई भला क्यों करे. पर इस पार्क में हमें इसकी कमी नहीं खलती. हमारा हौसला बढाने के लिए यहाँ होते हैं यहाँ चिड़ियों के समूह जो हमें हमारी थकान का आभास भी नहीं होने देते. झाड़ियों और झुरमुटों से गुजरते हुए ये साइकिल ट्रैक "तूर द फ्रोंस" की तरह तो सुन्दर नहीं लगते क्योंकी वह तो बहुत ही  खूबसूरत घाटियों से गुजरती है. पर एक पार्क में जितनी खूबसूरती इसे बख्शी जा सकती है, उतनी खूबसूरत यह लगती है. आप जैसे ही झाड़ियों और झुरमुटों से होकर गुजरते हैं, छोटी छोटी चिड़ियाँ आपके अगल-बगल और ऊपर से फुदकती हुई फुर्र हो जाती हैं. पास के बड़े पेड़ों पर बैठे तोतों और नीलकंठ का दल अचानक ही उड़ान भरने लगता है. इस तरह के दृश्य जब आपके चारों ओर पसरे हों तो दौड़ की मुश्किलों का ख़याल भला किसे रहेगा!!! और यहाँ ऐसा ही होता है. पता लगा की आप एक नन्हीं सी पहाड़ी की ऊँचाइयों को पार करने की चिंता अभी कर ही रहे थे की पाखियों का दल वहाँ आपके स्वागत में समवेत स्वर में गान छेड़ देते हैं. ऐसे में आप अपने पैर में मरोड़ की चिंता करेंगें की इस दुर्लभ ऑर्केस्ट्रा का आनंद उठायेंगें!!! कहीं पर तो किसी झुरमुट में जमे इन नन्हीं चिड़ियों का कलरव और आपके वहाँ पहुँचते ही बढ़ जाता है और वे घबराकर भागते नहीं. 

हाँ, दुबई एअरपोर्ट के समीप होने की वजह से विमानों की आवाजाही से उत्पन्न विचलित कर देने वाली आवाज़ इन चिड़ियों को ज्यादा परेशान करती है और वो इन आवाजों से त्रस्त होकर इधर उधर भागने लगती हैं. अगर ये आवाज न हों तो नीलकंठ, तोते और कतिपय अन्य पक्षियों को हम परेशान होकर भागते नहीं बल्कि पेड़ों की टहनियों पर बैठे आपस में बतियाते और गाते देख सकते थे. 

प्रकृति जहां इस तरह अपने पंख फैलाए बैठी हो, जहां अपने विभिन्न रूपों को इस तरह उकेर  रही हो वहाँ दौड़ते हुए भला तकलीफ का अनुभव किसे होगा!!! सो हमें भी नहीं हुआ और अगर हुआ भी, जो की स्वाभाविक है, तो इन चिड़ियों ने हमें इसका आभास नहीं होने दिया. 

इनसे अगली मुलाक़ात का हमें इंतज़ार रहेगा. 

बुधवार, 23 नवंबर 2011

रहा नहीं गया ..

काफी दिनों से सोच रहा था की मैं भी अपना ब्लॉग बनाऊँ और कुछ लिखूं. कई वजहों से ऐसा कर नहीं पाया. पर अब नहीं. अब मैं भी आ गया हूँ अपने मन की बात कहने के लिए. इन्टरनेट ने स्वतंत्र लेखन को एक नयी ऊंचाई और नया आयाम दिया है. इसी का फायदा मैं भी उठा रहा हूँ. यह जगह मेरी है और मेरी बातों के लिए है, यह एहसास अपने आप में बहुत ही सुखकर है. उतना ही सुखकर जितना किसी मनोहारी दृश्य को देखने के लिए कोई  सर्वाधिक उपयुक्त जगह मिल जाए. मैं भी अपने इस छोटी सी जगह को गाय के गोबर से नीपूंगा और अरिपन से सुसज्जित करूंगा. और फिर उस पर यथास्थान अपने मन की बातों को रखूंगा. अगर आप लोगों को अच्छा लगा तो उसे अपना सौभाग्य मानूंगा. आपकी आलोचनाओं को भी हम सहेजेंगें. और शायद वो मेरे सबसे अमूल्य धरोहर होंगें.